शतरंज का एक प्यादा
वैसे तो हम प्यादों का
ज़न्म अपने राजा की रक्षा करते हुए, मरने के लिए ही
होता है। कई बार तो हमें पता भी नही चल पता कि हमारी जीत हुई या हार। या तो फिर कभी एक-आध बच जाते हैं, जीत का जश्न या फिर हार का दुख मानते हुए। मेरा
जन्म भी ऐसी ही कुछ तक़दीरों के बीच हुआ था।
मेरी कहानी शतरंज के उस
प्यादे की है, जो सारी उलझानो और
कठिनाइयों को पार करके अपने तक़दीर को गले लगाता है। ज़िंदगी मुझपे इतनी मेहरबान
कभी ना थी, जैसे उस सुबह मुझे मेरे
युद्ध के अंगवस्त्र के साथ मैदान में सुसज्जित किया गया था। बहुत ही सुहावना मौसम
था। ठंढी पुरवाई चल रही थी। धीमी आहत से सूरज अपनी सौर्य को बढाता जा रहा था।
चारों तरफ हरे भरे पेड़ लहलहा रहे थे।
आज के युद्ध में मेरे
कौशल को देखते हुए मुझे दल के हाथी की रक्षा के लिए उसके सामने खड़ा किया गया था। मैदान
के कोने में होने के कारण शायद दिल को तस्सली रहती थी पर तस्सलियों से कठनाईयाँ तो
कम नही होती ना। एक भाले से किसकी रक्षा करें?? स्व्यं या अपने राजा की?? और यही कहानी सामने दल के प्यादो की भी है। वो भी हमारी ही
तरह अपने जीवन की वास्तविकता को स्वीकार किए हुए हैं।
युद्ध धीरे धीरे अपनी
रफ़्तार ले रहा था। तभी दूसरी दल का घुरसवार मेरे बगल से तेज़ी से गुजरा। दिल कुछ
समय के लिए सुन्न सा रह गया, मानो साँस ही अटक
गयी हो। अभी तक मैं युद्ध में एक कदम भी आगे नही बढ़ा था।
मेरे दल काफ़ी
सुरक्षात्मक स्थिति में था। मैने हल्के से एक चाल भरी। ज़िंदगी खुशहाल थी, पर डर सामने बैठे उसके ऊँटसवार से था, ऐसा लग रहा था मानो वो अपनी जीत का ढिंढोरा, मेरी ज़िंदगी खत्म कर के, पीटने वाला था। बड़ा
वहसी सा दिख रहा था। उसने हमारे दल के घुड़सवार को मार गिराया था। उसकी खून से भरी
तलवार देखकर मन विचलित सा हो गया।
पर, मेरे मंत्री ने अपनी अलग साजिस कर रखी थी। दूसरे दल ने, अचानक से मेरे मंत्री क़े चक्रव्यूह को ध्यान दिया और उसकी
नज़र अपने ऊँट से हटकर मेरे मंत्री के सामने पड़े एक और प्यादे पे पड़ी, तभी मौक़े की नज़ाकत को ध्यान में रखकर, मैं एक क़दम आगे बढ़ गया।
युद्ध अपने चरम पे था। हमारे
दल का मंत्री अपनी बेवकूफी से वीरगति को प्राप्त हो गया था। मैं दुश्मन के घर के
काफ़ी नज़दीक था। मेरी लालच मेरे संयमता के आगे झुक रहा था। मेरे सामने मेरे दल का
घोड़ा था, जो मेरी रक्षा कर रहा था। दो कदम की दूरी मानो
सालो बीत रहे थे। मैं अपनी नियति के काफ़ी नज़दीक था। मेरी जीत, मेरे सामने खड़ी थी और मेरी रक्षा मेरे घुरसवार कर रहे थे।
उस वक़्त मुझे अपनी एहमियत समझ में आई। सब वक़्त का खेल है। किस्मत तो हमें वसीहत
में ही मिली है।
मेरे दल का घुरसवार और एक
प्यादा, दूसरे दल के राजा के नाक में दम कर रहा था। काफ़ी
परेशानी में दिख रहा था वो राजा। इसी बीच मैने चुपके से अपनी तक़दीर की तरफ एक और
कदम बढ़ाया। दूसरे दल का राजा, दूर से ही मेरी
नीतियों से वक़िफ था, मगर साथ ही साथ अपनी
कठिनाइयों से भी मज़बूर था और मेरी ओर आकर्षित होने की स्थिति में नही था। उसने
अपने आप को बचाना उचित समझा और दो प्यादो के बीच आ कर खड़ा हो गया। पर इस मुठभेड़
में मेरी आँखों के सामने मेरे दल के प्यादे की मौत हो गयी।
मेरी खुशी का ठिकाना नही
था। मेरे जीवन का उद्धेश्य पूरा हो चुका था। सितारों से भरा एक मेडल मुझपे
विराजमान होने आ रहा था। उत्शाह के अंकुरों ने मन में एक जंगल सा बना दिया था।
बहुत अच्छा लग रहा था। मैने अपनी छोटी
से पोशाक बदल कर मंत्री के ढाल को अपने उपर चढ़ाया। उस ढाल के साथ अकड़ में भी एक
बदलाव था। इस युद्ध को जीतने का आत्मविश्वास और भी गहरा हो गया था मेरा। मैने अपनी
जगह से चारो ओर नज़र दौड़ाई। सभी सिपाहियों और सवारों का चेहरा गर्व से भरा हुआ था
और बधाई मॆं नजरों से सलामी ठोक रहे थे। राजा ने सहमति में सिर हिलाया और कमान उठाने का
आदेश दिया।
तभी, दूर तिरछे में खड़ी दूसरे दल का मंत्री मुझे झाँक रहा था।
मैं सीधा उसके निसाने पे था, और वो मेरी
बेवकूफी का फायदा उठाकर बड़े उल्लास के साथ मुझे खत्म करने आ रहा था। उसकी आँखे
मुझे एक बार फिर मेरे प्यादे होने का एहसास दिला रही थी। और एक तीर मेरी छाती से आ
लगा। मेरी नज़रें धुंधली हो रही थी। मेरे दल के लोग क्रोध और बेबसी से चिल्ला रहे
थे शायद मैं उनकी जीत की आखरी उम्मीद था।
एक झुंझलाहट थी मन में,
अपने आप पे गुस्सा था। पर शायद प्यादों की
ज़िंदगी का मक़सद ही इतना होता हो, ये सोच कर अपने आँखें मूंद ली।
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