Sunday, January 24, 2016

Rains & You!!!



That was a day to live,
When all my senses started to breathe…

Coming from an unknown, going to him,
“Cats & Dogs” has merely become a synonym…

Beauty of darkness has created an aura,
Scintillations, added the beauty with plethora…

People gathered, traffic unchained,
Everyone finding their way to sustain…

Amidst, I, sitting on a tree at the corner of the lake,
Dripping into the moment, a lot more to crave…

Closed my eyes and looking beyond my reach,
Felt like this whole world is nothing, but just a breach…

In between my thoughts, I gone too far,
Villains of my thoughts left some scars…

Suddenly, the subconscious played a trick,
Suddenly, felt the scars have started getting healed…

Thousands of faces have a lot to mention,
a distinguished face from the crowd, gathered my attention…

Was it the weather or the reality??
Confused for a while with those vitality..

From the canopies of those umbrellas, got a glimpse of her splattered KAJAL,
WOW!!!!Gazed at those, and drowned into its blackness…

Those scared red eyes, fighting with droplets,
And the curls of hairs, supplemented the aroma of rains…

I was standing with ecstasy on my veins,
A new hormone has erupted along with the stream…

Trying to get the gaze of splendid creativity of Almighty,
Had to gratify with the troublesome glimpse of deity…

She just crossed the road, while I was standing numb,
The effect of hormones has started getting crumb…

Brain was playing thousands of hoaxes with me,
Only an answer will let them flee…

I, still sitting on a tree at the corner of the lake,
Reminiscence of those enticing eyes still making me slake…




















कुछ लम्हों की आत्मकथा



कुछ लम्हों की आत्मकथा

सुबह के करीब 10 बज रहे होंगे| गायें और भैंसौं का झुंड कतार में खेतों की तरफ निकल चुका था अपनी दिन चर्या संभालने के लिए। उन में से कुछ विद्रोही गायें भी थी, जो अपनी कतार छोड़ के किसी बगीचे में मुह मार रही थी, तभी चरवाहा हांक के फिर से उसे अपनी जगह लाकर, उससे उसकी आज़ादी छीन रहा था| “हुह !!!!!”..शायद वहाँ की घास कुछ नरम हो, जो उससे अच्छी लगती होगी। खैर..किस्मत से ज़्यादा तो कभी किसी भगवान को भी नही मिला!!
तभी, बाँस के पेड़ो के झुंड से कोयल की सुरीली आवाज़ आई.. ”कूऊऊह..कूऊऊह"
मंटू ने अचानक से उपर बाँस के पेड़ो को देखा और उसके चेहरे पे एक मुस्कान सी आ गयी। वो वहीं रुक गया और बंसों के झुंड के बीच में उस कोयल को ढूँढने लगा; पर उसकी आँखों की सीमितता उसकी खावहइसों को मात दे गयी। चेहरे पे एक मलाल सा छूट गया। उसने फिर अपनी बंसी उठाई और चलने लगा। पूरा रास्ता गुल्मोहर के फूलों से भरा हुआ था। नये वर्ष के आगमन के लिए प्रकृति ने धरती को दुल्हन की तरह सज़ा रखा था। मंटू ने एक फूल उठाया और अपने कान के पीछे डाल लिया । नर्म हवा के झोंके उस फूल को टिकने नही दे रही थी; देवदार और अशोक के पेड़ मस्ती में झूम रहे थे, मानो वसंत ऋतु की वास्तविकता आज भी उनमे विद्यमान हैं ।
मंटू ने फिर से दो खिले हुए लाल फूल उठाए और दोनो कानो के बीच ज़ोर से दबा दिया और खुशी से मंदिर की तरफ जाने लगा। वहाँ पहुँच कर उसने अपनी बंसी किनारे में रखी और दोनो हाथ ज़ोर कर, आँखें मूंद कर, भगवान से प्रार्थना करने लगा। मंदिर में कोई भी नही था; लगता है कोई आता भी नही यहाँ। एक समय में काली माँ मंदिर हुआ करता था। काफ़ी जर्जर स्थिति में है; पर आस्था का सांसारिकता से क्या मेल?
मंटू ने अपनी बंसी उठाई और मंदिर के पीछे तालाब पे चल पड़ा।
प्रणाम बाबा” मंटू ने वहाँ तालाब के किनारे चारपाई पे लेट एक वृद्ध से कहा।
तू फिर से आ गया, आज भी कोई मछली मिलेगी या नही??” वृद्ध ने कहा।
क्यों नही मिलेगी??, आज तो काली मैय्या ने कसम दिया है” मंटू ने मुँह सिकोंरते हुए कहा, जैसे अपनी हार को आशावाद से छुपा रहा हो।
हर रोज़ की तरह वो अपनी जगह पे बैठ गया । अपनी जेब से गूथा हुआ आटा निकाला और महीन महीन टुकड़े करने लगा । एक टुकड़ा उसने अपनी जेब में संभाल कर रखा जैसे अपनी उमीदों को छुपा रहा हो| फिर टुकड़ा उठा कर अपने बंसी के काटें पे लगाया और धागे को पानी में फेक दिया ।
काफ़ी देर तक उस पुआल से बने हुए मंगाई (fishing floats) में कोई हलचल नही हो रही थी| उसने बंसी खींच कर काँटे को देखा|
एहह्ह्ह्ह!!!!!” मंटू ने झल्लाहट में कहा और आंटे का एक और टुकड़ा काँटा पे लगा दिया ।
वो शायद मछलियों के चतुरता के सामने अपनी नाकामयाबी से दुखी था ।
इस बार बड़ी गंभीरता से मंटू मंगाई पे टकटकी लगाए हुए था; तभी इसकी नज़र किनारे में तैर रही दो छोटी मछलियों पे पड़ी, और इसी बीच मंटू ने मंगाई में हलचल देखी । पर, मछली ने फिर एक और बार मंटू के व्यक्तितवा को झकझोर दिया और फिर यह नाकामयाबी का दौर काफ़ी देर तक चलता रहा ।
दोपहर के 3 बाज गये थे । मंटू अभी भी अपनी जगह पे बंसी हाथ में लिए बैठा था । उसके आँखों की अस्थिरता, उसके शरीर की हलचल उसकी मायूसी बता रही थी । पर वो अपनी जगह से हिल नही रहा था । तभी उसकी नज़र उन्ही दो मछलियों पे पड़ी...
“यह तो वही मछलियाँ हैं..लगता है फिर से आई हैं मुझे परेशान करने” उसने सोचा
वो मछलियों को देख रहा था, उसे लगा यह मछलियाँ भी उसकी तरफ देख रही हैं और उसका मज़ाक बना रही हैं..दोनो हँस रही हैं इसके व्यक्तित्व पर, जो इसके कद और साहस पर एक मखौल था..उसे लगने लगा यह सब मछलियों की साजिस है मेरे खिलाफ; ये इन्हे, यहाँ मुझे परेशान करने के लिये आती हैं पूरी राजनीति चल रही है इस तालाब के अंदर। पर मैं भी हार नही मानने वाला, आज जाऊँगा तो मछली ले कर ही जाऊँगा”
“रे मंटुआ, घर नही जाएगा खाना खाने??” बुड्ढे बाबा ने आवाज़ लगाई
चाहे तो काली मैंया के आशीर्वाद का भरोसा था या फिर मछलियों के जीत के सामने अपनी नाकामयाबी से विवश था, मंटू बोला “नहीं आज तो मछली ले के ही जाऊँगा !!!”
“पागल हो गया है, लगता है!!!” बुड्ढे बाबा ने धीरे से बोला
“अच्छा!! यहाँ आ जा, एक रोटी खा ले” बुड्ढे बाबा ने आवाज लगाई
मंटू ने तुरंत बंसी किनारे में रखी और बाबा के चारपाई के पास दौड़ के गया । उसने एक रोटी उठाई, अचार के दो टुकड़े उठाए और प्याज़ का छोटा टुकड़ा हाथ में ले कर फिर से अपनी जगह भाग के गया ।
दिन भर की थकान के बाद रोटी के उस पहले कौर ने मंटू के चेहरे पर खुशी ले आई । दो कौर खाने बाद, उसने फिर से बंसी उठाई और पानी में डाल दिया..
उसकी एक नज़र मंगाई पे टकटकी लगाए हुए थी और दूसरी तरफ वो अपनी शारीरिक क्षमता के साथ  आलिंगन कर रहा था ।
तभी अचानक से मंगाई में हलचल हुई; उसने धागे को ज़ोर से खीचा, काँटे पे एक मछली फरफारा रही थी ।
मंटू की खुशी का ठिकाना नही रहा; पर जब तक मंटू धागे को पानी के बाहर खीँच पाता, मछली काँटे से छूट कर तालाब में गिर गयी; शायद, चोट इतनी भी गहरी नही थी की मछली की जान ले सके; वो सहमी हुई पानी के अंदर चली गयी ।
मंटू ने झल्लाहट में बंसी हाथ से फेंक दी और तालाब में, आस पास पड़े कंकड़ पथ्थर मारने लगा, यह सोच के की शायद कुछ चोट उन मछलियों को जा के लगे जो सुबह से इसके नाकामयाबी के असतित्वता को मज़बूत किए जा रहा है । दस साल के बच्चे की, क्रोध की चंचलता इससे ज्यादा और क्या हो सकती है??
उसने बगल में पड़े आँटे के टुकड़े को देखा । कुछ टुकड़े अभी भी बचे थे, उसने अपनी जेब से छुपाया हुआ आँटे के टुकड़ा भी वहीं रख दिया । अपनी इस हार से वो काफ़ी दुखी था, पर अपनी आशाओं से मज़बूर था । उसने काँटे पे एक टुकड़ा लगाया और पानी में फेक दिया ।
शाम के 5 बाज गये हैं । बंसी तालाब के किनारे की झारियों पे पड़ी हुई थी । आँटा ख़तम हो चुका है । मंटू टकटकी लगाए तालाब में अपनी बुझती हुई परछाई को देख रहा है । सूरज धीमी धीमी कदमों से आज की विदाई ले रहा है ।
मंटू ने पास में पड़े अपनी बंसी उठाई, आँटा रखने वाला काग़ज़ अपनी जेब में डाला और उपर चढने लगा ।
प्रणाम बाबा!!!” मंटू ने बाबा को आवाज़ लगाई
मछली तो नही मिली होगी आज भी” बूढ़े बाबा ने पूछा
नही बाबा!! पर कल ज़रूर मिलेगी” मंटू ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया और अपने मंदिर की तरफ चल पड़ा..
गुल्मोहर के फूल भी शाम के आँधियारे में अपने सौंदर्य से वंचित थे । मंटू ने एक फूल उठाया और अपने कान के पीछे लगा लिया; फिर कोई गीत गुनगुनाते हुए अपने घर की ओर जाने लगा ।